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जिसे नकारा गया; सबसे लंबे समय तक CM रहने वाले दूसरे नेता होंगे नवीन पटनायक

भुवनेश्वर।  ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक रविवार को देश के दूसरे सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सीएम बन जाएंगे। बंगाल के दिवंगत कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ज्योति बसु को पछाड़कर पटनायक यह उपलब्धि हासिल करेंगे।

उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में 23 साल और 139 दिन पूरे कर लिए हैं, जो राज्य की राजनीति पर उनके पूर्ण प्रभुत्व को दर्शाता है। नवीन पटनायक 76 साल के हैं। 1997 में नवीन के पिता व पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की मृत्यु के बाद उनके विरोधियों ने उन्हें नौसिखिया कहकर खारिज कर दिया था। मगर आज उन्होंने इन सभी को प्रशंसा के साथ शांत बैठने के लिए मजबूर कर दिया है। वह लगातार अपने विरोधियों को ध्वस्त करते जा रहे हैं।

सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग के पास दिसंबर 1994 और मई 2019 के बीच 24 साल और 166 दिनों तक सबसे लंबे समय तक CM रहने का रिकॉर्ड है। बसु ने लगातार 23 वर्षों तक पूर्वी राज्य पर शासन करने के बाद 2000 में बंगाल के सीएम का पद छोड़ दिया था। वहीं, चामलिंग हिमालयी राज्य पर शासन करने के बाद मई 2019 में विधानसभा चुनाव हार गए थे।

एक एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन, दून स्कूल और सेंट स्टीफन से पढ़े-लिखे पटनायक ने राजनीति की कला बहुत जल्दी सीख ली। उन्होंने पहली बार 1997 में अस्का से लोकसभा उपचुनाव जीता था। यह सीट उनके पिता बीजू पटनायक की मृत्यु के बाद खाली हुई थी।

भाजपा की मदद से पटनायक व अन्य लोग जनता दल से अलग हुए और बीजू जनता दल का गठन किया। यह नाम उनके पिता के नाम पर रखा गया। अगले साल लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी ने भाजपा से गठबंधन कर लिया। पटनायक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में इस्पात और खान मंत्रालय में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने।

महाचक्रवात से तबाही और फिर नवीन का सीएम बनना

अक्टूबर, 1999 में महाचक्रवात आया था। इसमें 10 हजार से अधिक लोग मारे गए और तटीय ओडिशा के अधिकांश हिस्से तबाह हो गए। अगर यह तबाही न आती तो शायद पटनायक केंद्रीय मंत्री बने रहते। उस वक्त कांग्रेस शासन ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो युवा बेटों की हत्या सहित कई विवादों में घिरा हुआ था, तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरिधारी गमांग ने ऐसे समय में अपने हाथ खड़े कर दिए, जब लाखों उड़िया लोगों चक्रवात में अपना घर और चूल्हा खोने के बाद भोजन व आश्रय की तलाश थी।

बीजद का भाजपा के साथ गठबंधन 2009 तक जारी रहा। हालांकि, कंधमाल दंगों के बाद यह गठबंधन टूट गया, जिससे उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि पर दाग लगने का खतरा था।
नवीन पटनायक को गिराने की नाकाम कोशिशें

बीजेपी ने नवीन पटनायक को पद से हटाने के लिए कई प्रयास किए, मगर असफल रही। कई लोकलुभावन पहलों, मजबूत और अच्छी तरह से स्थापित पार्टी कैडर के कारण उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई। एक तरफ जहां उनकी साफ-सुथरी छवि वाले राजनेता की छवि उन्हें अच्छी स्थिति में रखती है, वहीं उनकी सबसे बड़ी धार चुनौती के सामने राजनीतिक गतिशीलता है। 2019 के चुनावों से पहले उन्होंने नकद सहायता कार्यक्रम शुरू किया। साथ ही स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के लिए धन और सहायता मुहैया कराने की पहल हुई। ये सब उनके वोटबैंक का बड़ा हिस्सा हैं। पटनायक ने अपने वोटबेस को बरकरार रखने के लिए हर संभव प्रयास किया है। राज्य ने 5 साल में 2 बार पुरुष हॉकी विश्व कप की मेजबानी की। साथ ही भारतीय पुरुष व महिला हॉकी टीम को प्रायोजित किया। पटनायक ने अपने 23 साल के शासन में मतदाताओं के बीच व्याप्त सत्ता विरोधी भावना से लड़ने के लिए खेलों का भी इस्तेमाल किया है।
चरमरा गई वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार

मार्च 2,000 में उन्होंने चक्रवात से प्रभावित ओडिशा की कमान संभाली। पिछले शासनों की अक्षमता और भ्रष्टाचार से ग्रस्त वित्तीय फिजूलखर्ची के कारण राज्य की वित्तीय स्थिति चरमरा गई थी। 2001-02 के अंत तक राज्य अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 6.06% की सीमा तक राजस्व घाटे में पहुंचा। मगर, पिछले 23 वर्षों में राज्य की प्रति व्यक्ति आय 1999-2000 में 10,662 से बढ़कर 2022-23 में 150,676 रुपये हो गई है। 1950 और 1980 के बीच ओडिशा की विकास दर लगभग 2.77% थी जबकि देश की विकास दर 3.5% थी। 2012-13 से ओडिशा की जीडीपी 8.10% की औसत वार्षिक दर से बढ़ रही है, जो 2014-15 व 2017-18 को छोड़कर पिछले सात वर्षों में राष्ट्रीय जीडीपी से ज्यादा है।

अकाल मौतों और बच्चों की बिक्री के लिए कुख्यात था राज्य

80 और 90 के दशक में भुखमरी से होने वाली मौतों और बच्चों की बिक्री के लिए ओडिशा कुख्यात रहा। इस स्थिति ने भोजन के निवाले पर गुजारा करने वाले दुर्बल पुरुषों और महिलाओं की छवि को जन्म दिया। 60 के दशक में सूखा प्रभावित कालाहांडी-कोरापुट जिलों से हजारों लोगों की भूख से मौत हो गई थी। इसमें उस उक्त बड़ा बदलाव आया, जब सरकार ने 2008 से 55 लाख बीपीएल परिवारों को 2 रुपये प्रति किलोग्राम चावल उपलब्ध कराना शुरू किया। 2013 में इसने दरों को घटाकर 1 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया। इसी हफ्ते की शुरुआत में नीति आयोग की एक रिपोर्ट आई है। इससे पता चला कि ओडिशा ने पिछले आधे दशक में राज्यों के बीच बहुआयामी गरीबी में चौथी सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है। बहुआयामी गरीबों का अनुपात 2015-16 में 29.34 प्रतिशत से गिरकर 2019-2021 में 15.68 प्रतिशत पहुंच गया।

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