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उत्तरकाशी उत्‍तराखण्‍ड न्यूज़

uttarkashi news समळौ॑ण का 1 पौध रोपकर पिता को किया याद

uttarkashi news जनपद उत्तरकाशी के ग्राम तिलोथ एवं शिव पूजा भंडार माल रोड़ उत्तरकाशी के स्वर्गीय श्री शिवप्रसाद नौटियाल जी के वार्षिक पिंडदान एवं श्राद्ध के उपलक्ष में उनके पुत्र सुभाष चन्द्र नौटियाल, पुत्रवधु श्रीमती विजेता नौटियाल एवम सुपौत्री प्रा॑सी नौटियाल द्वारा पुण्य आत्मा की याद में वट वृक्ष का समळौ॑ण पौधा श्याम स्मृति वन में वरुणावत पर्वत के संरक्षक पर्यावरणविद् श्री प्रताप सिंह पौखरियाल जी के नेतृत्व में रोपकर पिता को याद किया, पौधे के संरक्षण की जिम्मेदारी स्वयं प्रताप पौखरियाल जी ने पंडित श्री सुन्दर लाल नौटियाल जी से मन्त्रोचारण के साथ संकल्प लिया। uttarkashi news

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uttarkashi news कार्यक्रम में सुभाष के चचेरे ज्येष्ठ भाई विकास नौटियाल ने कहा कि पितृ स्मृति यानी समलौण में हम जो वृक्ष लगाते हैं,वह हमें आजीवन उनकी समलौ॑ण दिलाता रहेगा। पेड़ पौधों का मनुष्य जीवन में बहुत बड़ा महत्व है,

इसलिए मनुष्य को अपने बुजुर्गों और प्रियजनों की समलौ॑ण में कम से कम 5 वृक्षअवश्य लगाने चाहिए, वहीं सुभाष के अनुसार उनके पिता को इससे बड़ी कोई श्रद्धांजलि नहीं हो सकती है कि उनके नाम पर लगाया गया वृक्ष हरा भरा रहे और शीतल छाया दे,हर मानव पर पर प्रकृति का ऋण होता है जो न केवल जीते जी अपितु देहावसान के बाद भी रहता है, अगर हम उनकी स्मृति में उनके नाम से कोई पौधा लगाते हैं तो यह ब्रह्मभोज से भी बड़ा पुण्य कार्य है। uttarkashi news

uttarkashi news कार्यक्रम का संचालन डाक्टर शम्भू प्रसाद नौटियाल द्वारा किया गया

कार्यक्रम का संचालन गंगा विश्व धरोहर मंच के संयोजक एवं समलौण आंदोलन के सलाहकार डाक्टर शम्भू प्रसाद नौटियाल जी ने किया, उन्होंने कहा समलौण पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए एक अनोखी पहल है, जिसमें गांव गांव में छोटी छोटी इकाइयां समळौ॑ण सेना के रूप में हर संस्कारो के उपलक्ष में घर घर में जिन पौधों का रोपण किया जाता है उन्हें समलौण पौध के नाम से जाना जाता है,

जो पर्यावरण के लिए हर मानव के अन्दर एक नयी॑ जागृति पैदा कर देता है, उन्होंने कहा प्रकृति हमें सब कुछ देती है, लेकिन हम प्रकृति को कुछ नहीं देते हैं,उस ऋण से उऋण हम तभी हो सकते हैं,जब अधिक से अधिक वृक्षारोपण का कार्य करेंगे, और उनका संरक्षण कर अपने भविष्य को बचाने का संकल्प ले सकते हैं।

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