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मथुरा ठप्पा किसानों का मंशा राजनीति की, सहारा आका का!

-मथुरा में किसानों से दूर खिसकती किसान संगठनों की राजनीति

-मुद्दे हजार, भरपूर रार, पर किया धरा सब हो रहा बेकार

मथुरा । जनपद में किसान संगठनों की राजनीति किसानों से दूर है। जनपद में आधा दर्जन के करीब किसान संगठन सक्रिय हैं लेकिन किसानों पर उनकी पकड़ बहुत ढीली है। स्थिति यह हो गई है कि किसान संगठन के नाम पर आंदोलन और प्रदर्शन किये जा रहे हैं उनमें कई बार तो दर्जन भर कार्यकर्ता तक नहीं जुटा पाते हैं।

 

वहीं कुछ तथाकथित किसान नेता अपने धनबल के जरिये साल दो साल में एक बार जिला मुख्यालय पर भीडभाड दिखा कर इतना सुनिश्चित कर लेते हैं कि अधिकारी उनके निजी काम तो कर ही देंगे।

इन संगठनों में सक्रिय किसान नेताओं की किसानों से ज्यादा पार्टी विशेष के नेताओं के साथ जुगलबंदी कहीं अधिक चर्चा में रहती है। विधान सभा चुनावों से ठीक पहले किसान संगठन या इससे जुड़े नेताओं का पार्टी अथवा राजनीतिक व्यक्ति विशेष के समर्थन का ऐलान करने जैसी वाकये भी सामने आये।

 

अब लोकसभा चुनावों से ठीक पहले किसान राजनीति के कद्दावर ठिकाना तलाश रहे हैं। इन ऐलानों से राजनीतिक समीकरणों पर कितना असर पड़ता है यह शोध और चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन इस तरह की कलाबाजी से किसान राजनीति को नुकसान पहुंचा है।

राजनीतिक दलों के भी अपने किसान संगठन हैं। किसानों को अपने पक्ष में एकजुट करने के तमाम प्रयास और कार्यक्रम इन संगठनों द्वारा भी किए जाते हैं। वर्तमान में भी यह प्रक्रिया सतत रूप से जारी है। एक बड़े राजनीतिक दल के किसान संगठन ने तो निकाय चुनाव के लिए बाकायदा अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित भी किया था। इसके लिए कई कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था। इस बीच किसान राजनीति को लेकर इस समय कई तरह के प्रयोग चल रहे हैं।

 

कई राजनीतिक दल यह महसूस कर रहे हैं कि पार्टी के नाम के साथ तमाम किसानों तक पकड मजबूत नहीं की जा सकती है। इसके लिए गैर राजनीतिक संगठन कहीं बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इनके साथ किसी भी राजनीतिक विचारधारा के समर्थक किसान को जोड़ा जा सकता है और फिर धीरे से अपनी विचारधारा में मिलाने का प्रयास कहीं बेहतर प्रयोग साबित हो रहा है। किसान राजनीति में यह प्रयोग पहले भी होते रहे होंगे लेकिन नई पीढ़ी के लिए जरूर नए और कौतूहल पैदा करने वाले हैं।

 

किसान संगठनों के कार्यक्रमों में भी यह झलक मिल जाती है कि इस संगठन के साथ किस दल की विचारधारा मेल खा रही है। कई बार तो यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि गैर राजनीतिक किसान संगठन के बैनर तले हो रहा कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल का है या किसान संगठन का है। तमाम चेहरे भी किसानों के नाम पर राजनीति करने वालों के रूप में अब जाने पहचाने हो गए हैं।

 

वहीं ऐसे नेताओं को भी किसान पहचानते हैं जिनका किसानों से कोई वास्ता नहीं है लेकिन इन चेहरों के लिए किसान राजनीति में रहना अपरिहार्य कारणों से अनिवार्य सा हो गया है। किसानों की समस्या के समाधान के साथ शुरू होने वाले धरना प्रदर्शन या दूसरे कार्यक्रम आखिर तक अपनी असल जगह पर आ ही जाते हैं। जिसके लिए यह सब किया जा रहा होता है। यही वजह है कि किसान राजनीति के नाम पर होने वाली उठापठक से दूर आम किसान अक्सर किनारे खडा दिखाई देता है।

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