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आधुनिक समाज में शिशुओं को स्तनपान न कराने का प्रचलन व पेरेंटल केअर में अत्यधिक लापरवाही।

कहा जाता है कि दूध एक संपूर्ण आहार है, शिशु द्वारा बाल्यकाल में अपनी माँ का स्तनपान किया जाता है। वास्तव में माँ का दूध एक नवजात शिशु के लिए अमृत, व चमत्कारिक औषधि के समान होता है, जिससे धीरे-धीरे शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती चली जाती है। प्रारंभिक छः माह तक बच्चे के शरीर में इंटरनल ऑर्गन्स के विकास की प्रक्रिया गतिमान रहती है। तब तक शिशु दूध के सिवाय कोई भी अन्य ठोस आहार ग्रहण करने हेतु तैयार नहीं रहता है। माँ के दूध में बच्चे के पोषण के लिए सभी प्रकार के आवश्यक तत्व विद्यमान रहते हैं। यदि बच्चे को माँ का दूध कम से कम चार-पांच साल तक पिलाया जाय तो उसके असीमित रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त स्वस्थ व सुखी शारीरिक जीवन की नींव रखी जा सकती है।

आजकल समाज में पेरेंटिंग के मायने कुछ बदलते जा रहे हैं। इस तथाकथित आधुनिक समाज में अधिकांश महिलाएं अजीबोगरीब बहाने बनाकर शिशुओं का दूध छः या आठ माह में ही छुड़वा देती हैं। कोई जाॅब या पेशे की व्यस्तता के बहाने, कोई अपने आकर्षक फिगर को मेंटेन रखने के बहाने, तो कतिपय महिलाएं स्तनपान क्रिया में लग रहे परिश्रम से मुक्त रहने की चाह में, अपने ही पेट से जन्मे उन अबोध शिशुओं के जीवन के साथ बड़ा-भारी खिलवाड़ करती हुई नजर आती हैं। इस प्रकार वह उनका जीवन असीमित खतरों में झोंक देती हैं। इन पेशेवर महिलाओं की बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो पहले के जमाने में महिलाओं के बच्चे ही नहीं हुए होंगे। गांव-घरों में पहले भी और आज भी महिलाएं खेती-बाड़ी के कठिन कामकाजों में सुबह से श्याम तक व्यस्त रहती हैं और एक व्हाइट कॉलर जॉब की तुलना में लाख गुना ज्यादा शारीरिक श्रम व व्यापार करते हुए, शिशुओं के वयस्क होने तक उन्हें स्तनपान करवाती हैं। माँ का दूध बच्चों को उचित समय तक न मिलने से उनके शरीर में आवश्यक रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास नहीं हो पाता है। वह बार-बार बीमार पड़ने लगते हैं। उनका शरीर बीमारियों के प्रति बहुत नाजुक व सुग्राही हो जाता है। परंतु आजकल की आधुनिक महिलाओं को समझाना बड़ा ही मुश्किल होता है, उन्हें तो बच्चों के स्वास्थ्य से ज्यादा अपने आराम की चिंता रहती है। बच्चों के लिए त्याग और बलिदान का जीवन जीते हुए स्वयं कष्टप्रद जीवन जीना तो माँ की स्वाभाविक प्रकृति होती है मगर आज के समय में इन सभी बातों के मायने ही बदल चुके हैं।

बच्चों को प्राकृतिक आहार के स्थान पर सिंथेटिक व आर्टीफिशियल आहार जैसे सेरेलैक, बाॅर्नवीटा, लैक्टोजन दूध पाउडर व मैगी इत्यादि दिये जा रहे हैं। इनमें नैस्ले जैसी बड़ी-बड़ी फूड-बेवरेज एवं एफ0एम0सी0जी प्रोडक्ट्स वाली मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पादों की बाजारों में बहुतायत में उपलब्धता रहती है। अभी हाल ही में दुनिया भर में एवं भारत सरकार ने, बाॅर्नवीटा एवं नैस्ले कंपनी के सैरेलेक प्रोडक्ट (जो प्रायः एक-दो साल के बच्चों को दिया जाता है) में मौजूद हाई शुगर कंटैट को लेकर एफ0एस0एस0ए0आई0 को जांच के आदेश दिये हैं।

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इसके अतिरिक्त आई0सी0एम0आर0 ने भी भारत में पैकेज्ड व प्रोसेस्ड फूड की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए ग्राहकों को उन उत्पादों की प्रामाणिकता को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है। आजकल यह अजीब सा प्रचलन चल पड़ा है कि घरों में बच्चों को प्राकृतिक आहार देने के बजाय टी0वी0 अथवा अन्य माध्यमों से प्रचारित इस प्रकार के खाद्य व पेय पदार्थ ही अधिकांशतया बच्चों को दिये जा रहे हैं। आजकल की आधुनिक माताएं अपने बच्चों को इन बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों को खिलाने में अपनी बड़ाई व प्रशंसा समझ रही हैं। उन्हें तनिक इतना ज्ञान नहीं हो पा रहा है कि इन सभी उत्पादों की व्युत्पत्ति कहीं न कहीं प्राकृतिक खाद्य पदार्थों से ही होती है। इन एम0एन0सी के द्वारा सिर्फ प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में अतिरिक्त शुगर, प्रिजर्वेटिव्स एवं हानिकारक रसायन मिलाकर उन्हें फैंसी व आकर्षक पैंकेजिंग में रैप कर मिसलीडिंग विज्ञापनों की सहायता से बड़ी-बड़ी ब्रैंड्स के नाम पर बेचा जाता है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इस दुनिया में प्राकृतिक आहार से बढ़कर विशुद्ध एवं प्रामाणिक कुछ भी नहीं हो सकता है। छः माह के बाद जब बच्चों के पाचन तंत्र और आतों में ठोस भोजन को पचाने की शक्ति विकसित होने लगती है तो शिशुओं को घर पर तैयार उचित पोषक भोजन के बजाय संरंक्षित व सिंथेटिक फूड दिये जाने का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है। बच्चे बेजुबान होते हैं वह अपनी आवश्यकता को जुबान के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते हैं। ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वह बड़ी ही संवेदनशीलता से बच्चों के स्वास्थ्य व उचित पोषण का खयाल रखें। उनको दिये जाने वाले आहार की मात्रा, बारंबारता व गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उनके जीवन की शारीरिक व मानसिक सुरक्षा का भी पर्याप्त खयाल रखा जाना चाहिए।

कतिपय मामलों में आजकल की महिलाएं अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को केन्द्र में रखकर बच्चों को उनके शैशव-काल में ही स्वयं अपनेआप से, दादा-दादी व उनके पिता से वंचित कर किसी अन्य तीसरे व्यक्ति अथवा परिवार को सौंप देती हैं, जहां उनका जीवन बड़ा ही असुरक्षित व दयनीय हो जाता है। लाख समझाए जाने पर भी वह अपनी ऐसी क्रूर व निर्दयी मानसिकता से बाज नहीं आती हैं और खुद समझने के बजाय पलटकर नसीहत देने लगती हैं। शिशुओं एवं बच्चों की पेरेंटिंग अथवा परवरिश का उचित ध्यान रखा जाना बड़ा ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि बचपन ही व्यक्ति के शारीरिक व चारित्रिक विकास की नींव है। आगे चलकर बच्चों को बचपन में दिये गये संस्कार ही पुष्ट व परिणत होते हैं। जीवन के शुरूआती चार-पांच साल तक तो बच्चों के मुख्य क्रियाकलाप खाने-पीने, सोने व बाल-क्रीड़ाओं तक ही सीमित रहते हैं। इसीलिए बच्चों के आहार का विशेष ध्यान दिया जाना परम आवश्यक है। कतिपय गार्जन्स स्वयं डाॅक्टर-स्पेशलिस्ट बनकर अपनी पुरानी अंधमान्यताओं व पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर बच्चों को सीजनल फल यथा आम, पपीता, केला, सेब, अनार इत्यादि एवं खाद्य व पोषक पदार्थो को खिलाने में बड़ी ही परहेज करते हैं। वह अपनी अज्ञानता, लापरवाही व असंवेदनशीलता के वशीभूत होकर बच्चों को समय-समय पर समुचित आहार नहीं देते हैं। प्रायः यह भी देखा जाता है कि वह बाहर से लिए गये दूध में भी आधा से अधिक मात्रा में तकरीबन 70 प्रतिशत तक पानी मिलाकर बच्चों को पिला रहे हैं। भला ऐसी गंभीर व भयावह परिस्थितियों में कैसे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो पायेगा, यह एक सोचनीय विषय है।

सामान्यतया पशुओं के व्यवहार को भी जरा ऑब्जर्व किया जाय तो उनकी माँ अपने बच्चों को इक पल भी अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहती, मगर मनुष्य इतना असंवेदनशील व पत्थरदिल कैसे हो सकता है, कि अपने ही पेट से जन्में बच्चे को परवरिश के लिए परायों के हवाले कर देता है। बच्चों के जीवन के साथ किसी भी और कितनी भी भीषण परिस्थिति में खिलवाड़ नहीं होना चाहिए, वह बेचारे अपने भावों को शब्दों के माध्यम से बयां नहीं कर सकते। वह यह भी व्यक्त नहीं कर सकते कि उनके साथ पराया व्यक्ति कैसा व्यवहार कर रहा है। पराये बच्चों का पालन-पोषण करने वाले धर्मवान व्यक्तियों का इस दुनिया में मिलना तो सचमुच दुर्लभ है। मगर मनमानी करने वाले व्यक्ति के सामने ब्रम्हा, विष्णु, महेश भी स्वयं धरती पर अवतरित हो जांय, पर वह अपनी अकड़ और घमंड  कभी नहीं छोड़ सकता। ऐसे लोगों में पेरेंटिंग के काॅमन सेंस का सर्वथा अभाव होता है। बच्चों के दैनिक क्रिया-कलापों पर हर पल सूक्ष्म नजर बनाये रखना गार्जन्स का प्रथम कर्तव्य है। बच्चों के साथ सड़क पर चलते समय वाहनों और पशुओं से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एवं घर में प्रयोग किये जाने वाले तमाम मैन्युअल व इलैक्ट्राॅनिक यंत्रों, औजारों अथवा शार्प ऑब्जक्ट्स तक उनकी पंहुच को प्रतिबंधित करना भी गार्जन्स की पूर्ण जिम्मेदारी है अन्यथा कि स्थिति में बच्चों के साथ बड़ी से बड़ी दुर्घटनाऐं घटित हो जाती हैं। एक दयावान और संवेदनशील हृदय ही अच्छी पेरेंटिंग के मायने समझ सकता है। सभी मामलों को दरकिनार कर, बच्चों की परवरिश में जरा सी भी चूक न हो यह गार्जन्स की सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। गार्जन्स की एक छोटी सी भी गैर-जिम्मेदाराना हरकत बच्चों के जीवन पर भारी पड़ सकती है।

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