उत्‍तराखण्‍ड पौड़ी गढ़वाल

वरिष्ट साहित्यकार श्री बिहारी लाल दनोशी जी को 80 वें जन्म दिन की हार्दिक बधाइयाँ……

आज पौड़ी के सर्किट हाउस सभागार में परम् सम्मानित श्री बी० एल० दनोशी जी का 80 वाँ जन्म दिवस बहुत शानदार ढंग से मनाया गया। इस सुअवसर पर पौड़ी के समस्त प्रबुद्ध जन, शिक्षक, साहित्यकार, साहित्य प्रेमी, पत्रकार, समाज सेवी, सामाजिक संस्थाएँ आमंत्रित थी।
वरिष्ट साहित्यकार श्री बी०एल० दनोशी जी के सम्पूर्ण परिवारिक सदस्य बधाई के पात्र हैं। आज जहाँ समाज में वृद्धजनों को हाशिए पर धकेले जाने की परम्परा जोरों पर है, वहीं दनोशी परिवार ने अपने उस विशाल वृक्ष को अपने हृदय में एक गुलदस्ते के समान संजो कर रखा हुआ है। दनोशी जी का सम्पूर्ण परिवार इस जन्मदिन को एक अविस्मरणीय यादगार बनाने की पूरी कोशिश करता दिखाई दिया। यह जन्म दिन अभूतपूर्व तरीके से मनाया गया जिसमें विभिन्न वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर अपने अनुभवों के आधार पर विशेष प्रशंसनीय और उल्लेखनीय टिप्पणियाँ की।
वरिष्ट साहित्यकार श्री दनोशी जी का जन्म 20 मई सन् 1944 को ग्राम गडोली पट्टी नांदलस्यूँ, पौड़ी में हुआ। सुमाड़ी गाँव की सौम्य व मृदुल स्वभाव की श्रीमती रुक्मणी देवी जी से उनका विवाह हुआ। आज से वे 80 वें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं। हम उनकी दीर्घायु की कामना करते हैं और आशा करते हैं कि वे समाज को अपने साहित्यिक सजर्नशीलता के माध्यम से आगे भी दिशा देते रहेंगे।

जो व्यक्ति अपने सरकारी सेवाकाल के दौरान पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ कार्य करता हुआ आया हो, जिसने अपने काम में कभी भी कोई कोतहाई न बरती हो, वह सेवा निवृत्ति के बाद भी उसी सेवा भाव से कार्य करता रहता है। लगन से और निष्ठा से जमा किया गया दनोशी जी का साहित्य भंडार अपने आप में एक अनोखा संग्रह है। जहाँ सेवानिवृत्ति के पश्चात् व्यक्ति थका-टूटा-हारा हुआ सा दिखाई देता है, इसके ठीक विपरीत इंजीनियर दनोशी जी उम्र के इस पड़ाव में पूरी सिद्दत और उत्साह के साथ विभिन्न सृजनात्मक कार्यों को करने में जुटे व डटे हुए हैं। उनकी इस निष्ठा, लगन और कार्यशीलता की जितनी प्रशंसा की जाए कम ही है। शोषितों के हितों के लिए आवाज उठाना, उनकी चिंता करना श्रेष्ठता पर रखा जाने वाला उनका योगदान है। ऐसे कर्मयोगी पुरुष सदा ही वंदनीय होते हैं।

मैं कई बार, और बार-बार लिखता हूँ और लिखता रहूँगा, साथ में कोसता भी रहूँगा कि यदि भारत में शिक्षा सर्व सुलभ होती, सब पढ़ें और सब बढ़ें का नारा आजादी से पहले के लोग लगा रहे होते तो निश्चित ही बिहारी लाल दनोशी जी बहुत बड़े वैज्ञानिक होते। दनोशी जी ही नहीं वे और भी होते जो गरीबी, सामाजिक प्रताड़ना के कारण पढ़ ही नहीं पाए थे जबकि उनके पास हुनरों की कोई कमी नहीं थी। ये हुनरमंद गरीब, असहाय यदि सम्पन्न परिवारों से होते तो आगे और रास्ते थे जिन पर चलकर वे अपना नाम तो रोशन करते ही, साथ ही साथ गाँव, जिला, प्रदेश, और देश का नाम भी रोशन करते।
उन्हीं गरीब परिवारों में माननीय दनोशी जी ने भी अत्यंत गरीब स्थिति में, तंगहाली में, अपनी लगन, मेहनत और महत्वकांक्षा को साथ लेकर मैसमोर इंटर कालेज से इंटर की परीक्षा पास की। पिता स्व० कीर्तिराम दनोशी और माता स्व० श्रीमती विसेश्वरी देवी जी पहाड़ी किसान थे। खेती से बमुश्किल भरण-पोषण होता था। इन विकट परिस्थितियों में बिहारी लाल जी उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए लखनऊ क्रिश्च्यन काॅलेज में गए। वहाँ से बी०एस०सी० पास किया। उस जमाने में बी०एस०सी० पास करना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वे अपने गाँव के पहले स्नातक व्यक्ति हैं। पहली नियुक्ति उन्हें लाइन सुपरवाइजर के पद पर उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड में मिली। 38 साल की सेवा देने के पश्चात् उपखण्ड अधिकारी विभागीय अधिशासी अभियन्ता ग्रेड से सन् 31 मई 2002 में सेवानिवृत्त हुए। सेवा निवृत्ति के पश्चात् लेखन कार्य में जुट गए। हम आशा करते हैं कि वे और मुखर होकर सामाजिक विद्रुपदाओं पर अपनी लेखनी और धारदार बनाएँगे.
बिहारी लाल दनोशी जी ने अपने जीवन काल में कई भूमिकाएं निभाई। पेशे से वे एक इंजीनियर हैं। पौड़ी के विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी। साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न पुस्तकें लिख कर एक संवेदनशील और शोधार्थी लेखक होने का गौरव अर्जित किया। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने विभिन्न संगठनों से जुड़कर समाज सेवा की। लम्बी-चैड़ी कद-काठी के व्यक्ति नारियल की तरह हैं। बाहर से सख्त और अंदर से मुलायम। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी दनोशी जी विनम्र, चिंतनशील और गम्भीर स्वभाव के हैं। हर किसी के प्रति आत्मिक दृष्टिकोण रखना उनका स्वभाव है।
सामाजिक विभेद और प्रताड़ना का शिकार हुआ व्यक्ति बहुत गहरे पैठ कर लिखता है। उसकी लेखनी चापलूसी की स्याही में डूबी हुई नहीं होती है, वह जो लिखता है कड़ा सच लिखता है। समाज के कटु अनुभव उसे बार-बार कचोटते हैं, उकसाते हैं कि लिख उस सच्चाई को जिसे तूने भोगा है। दनोशी जी के साहित्य में वह पीड़ी अनायास ही झलक जाती है। दनोशी जी ने साहित्य की अनेक विधाओं में लिखा। जिस भी विधा में लिखा उसमें उनकी आंतरिक पीड़ा हृदयतल से उतरकर कागज में और फिर पाठक के मन में बैठ गयी। समाज में व्याप्त अमानवीय क्रुरताओं को भोगना और खुद को सरवाइव करना बहुत जटिल काम होता है. उनके तंतु बहुत बारीक और सघनता से जुड़े होते हैं. उन बारीक तंतुओं को शब्दों का रूप वही दे सकता है जिसनें उन नुकीले तंतुओं की पीड़ा को भोगा होगा।
साहित्य के क्षेत्र में उनका जो सबसे बड़ा योगदान है वह ‘‘गढ़वाल के शिल्पकाराों का इतिहास’’ लेखन है। इस पुस्तक में उन्होंने सामंती समाज पर करारी चटकताळ भरे तमाचे मारे हैं। उन्होंने इस पुस्तक में उन क्रूर सामंती व्यवस्था को उजागर करते हुए लिखा- ‘‘सामंती कुप्रथा में देवी-देवताओं को प्रसन्न करने हेतु किसी भी शिल्पकार को जबरन पकड़कर उसकी बलि दे दी जाती थी। अनेक क्रूर सत्य उनकी इस पुस्तक में संग्रहीत हैं।
शिल्पकारों का सामाजिक जीवन, शिल्पकारों का साहित्यिक योगदान, शिल्पकार महिलाओं की वतर्मान स्थिति, अनुसूचित जातियों में स्वहित चिंतन जैसे उपबिन्दुओं पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक का सबसे बेहतरीन हिस्सा वह है जिसमें उन्होंने शिल्पकार समाज के मूधर्न्य शिल्पियों की लम्बी नाम सूचि उनकी विशेषज्ञता के साथ प्रस्तुत की है। वे शिल्पी जिन्होंने गढ़वाल मंडल को अपने शिल्पों के माध्यम से बेहतरीन बनाया, उनका यशोगान किया जाना बहुत आवश्यक है। उनके शिल्पी योगदान को अमर किया जाना नितांत जरूरी है। श्री दनोशी जी ने गढ़वाल मंडल के उन महान दिवंगत शिल्पी विभूतियों का यशोगान करके बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। ये वे महान व्यक्ति हैं जिन्होंने उत्तराखंड में बेडौल पत्थरों को तराश कर उनमें जान फूंक दी। आज भी उनके बनाए मंदिर, मूर्तियाँ, मठ, सरकारी भवन, निजी भवन शान से खड़े हैं और उन महान शिल्पकारों की याद दिलाते हैं। ये मूर्तिकार, प्रस्तरकार, काष्ठकार, ताम्रकार, संगीतकार, वादक हैं, जिन्हें इतिहास में कोई स्थान ही नहीं दिया गया था।
इसी पुस्तक में सत्ता के मंच पर शिल्पकार समाज के विधायक, सांसद, पंचायत स्तर पर विभिन्न पदों पर चुने गए जनप्रतिनिधियों की सूची, प्रशासन में अपनी भूमिका निभा रहे अधिकारी कर्मचारी, संगीत के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान देने वाले लोकगायक, अभिनेता, साहित्यकार, लोक साहित्यकार, वकील, पत्रकार आदि के नामों का उल्लेख करना सराहनीय कार्य है।
उनकी प्रकाशित अन्य रचनाएं हैं पायदान जो कि कविता संग्रह है। आरक्षण क्यों जरूरी है इस विषय पर लिखी पुस्तक है- शिल्पकार बनाम पिछड़ी जाति बनाम आरक्षण है। ऊर्जा प्रदेश उत्तराखंड के आधार स्तम्भ, सरकारी कलम नामक पुस्तक भ्रष्टाचार विषय पर लिखी कहानी संग्रह हैं। गरीब की माँ कहानी संग्रह में पहाड़ की संस्कृति एवं परम्पराओं पर आधारित कहनी संग्रह हैं। जमीन-आसमान उपन्यास है जो कि एक आई० ए० एस० अधिकारी की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। चन्द्रापुरम एक दलित लड़की की मामिर्क कहानी है जो समरस समाज की स्थापना में अपना जीवन नष्ट कर देती है। सौतेली माँ और आँचल का दाग कहानियाँ गरीबी में पली-बढ़ी बेटियों के संघर्ष, त्याग और शोषण की शिकार हुई बेटियों की मर्मस्पर्षी कहानियाँ हैं। इन्द्रधनुष हिन्दी उर्दू कविता संग्रह है।
अ बण्डल आफ बर्डन यह दनोशी जी की आत्म कथा है जो कि अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी है। इसका हिन्दी वर्जन भी उपलब्ध है।
उनकी अप्रकाशित पुस्तके हैं- पहाड़ी धुन, माई ओल्डेज डायरी भाग- 1 तथा पिंजड़े का पंछी। दबाए गए लोग अंग्रेजी से हिन्दी में अनुदित पुस्तक है। दलित विमर्श पर लिखी पुस्तक है- आजाद भारत में दलितों की स्थिति। इन पुस्तकों का समस्त पाठक समाज को इंतजार है।
साम ढलणी च यह उनकी पहली फिल्म है जिसके वे निर्माता हैं। इस फिल्म के लिए उन्होंने गीत, पटकथा और संवाद लेखन का कार्य भी किया। दनोशी जी को सम्मानित किया गया-
1- उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष1985-86 में बीस सूत्रीय कार्यक्रम मे सर्वोत्तम् कार्य सम्पादन करने के लिए 21 मार्च 1987 को मानपत्र एवं नगद धनराशि देकर सम्मानित किया।
2- सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने के लिए प्रतिष्ठित मेघदूत नाट्य संस्था देहरादून ने सांस्कृतिक गतिविधियों के निहित सम्मानित किया।
3- 2018 में उनको साहित्य सृजन के लिए मानपत्र के साथ कमर्वीर जयानन्द भारतीय शिल्पकार विभूति उत्तरांचल अवार्ड दिया।
4-भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने 10 दिसम्बर 2007 को महात्मा ज्योतिबा फुले फैलोशिप सम्मान से सम्मानित किया।
5- भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने 10 दिसम्बर 2013 को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर फैलोशिप से सम्मानित किया।
6- उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून ने गोविन्द चातक सम्मान से सम्मानित किया।
श्री बी एल दनोशी जी के 80वें जन्म दिवस के सुअवसर पर पौड़ी के सकिर्ट हाउस सभागार में विशिष्ठ अतिथि उत्तराखंड प्रादेशिक शिल्पकार कल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष श्री हरीश चन्द्र शाह जी उपस्थित रहे। उन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। दनोशी जी की पत्नी श्रीमती रुक्मणी देवी जी दनोशी जी के साथ मंच पर शोभायामान थी। मुख्य अतिथि धाद पत्रिका के सम्पादक, उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध मंच संचालक श्री गणेश खुगशाल गणी जी, दनोशी जी के दामाद इंजीनियर श्री जी एस कौंडल जी जो कि एस०सी०/एस०टी० फेडरशन के प्रदेश अध्यक्ष हैं, श्री विनोद दनोशी जी, प्रोपेसर रेखा नैथानी जी, प्रोपेसर अनीता रुडोला जी, प्रोपेसर लक्ष्मी कौंडल जी, डा० मुकेश शाह जी प्रवक्ता, सामाजिक कार्यकत्री श्रीमती सरिता नेगी जी, शिल्पकार कल्याण समिति के महासचिव श्री राजेश शाह जी, उपाध्यक्ष श्री सुनील कुमार, कोषाध्यक्ष श्री हुकुम सिंह टम्टा जी, सचिव श्री हरीश चन्द कोहली जी, श्री आर०पी० कोहली जी, लोक गायक भक्ति शाह जी, सुशील चंद्र जी, परिसंघ के श्रीकांत, भाष्कर बहुगुणा जी, लकेश आदि मौजूद थे। समिति के अध्यक्ष हरीश शाह जी, हुकुम सिंह टम्टा जी, राजेश शाह जी व सुनील कुमार जी ने दनोशी जी को समिति की तरफ से अंग वस्त्र भेंट कर उनको सम्मानित किया। मंच संचालन जे पे टम्टा जी ने किया। पौड़ी के अन्य गणमान्य व्यक्ति सभागार में इस कायर्क्रम के साक्षी बने।
पुनः दनोशी परिवार को मैं बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ। आपका सानिध्य सदा बना रहे.

महेशा नन्द
गडवाली साहित्यकार

1 COMMENTS

  1. पहाड़ की वाणी के सम्पादक महोदय जी का बहुत-बहुत धन्यवाद .

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